ख़िलाफ़त कया करूँ उस काग़ज़ के लफ़्ज़ से , जो आज कल हर किसी के लिए बन जाते है नये !

ख़िलाफ़त कया करूँ उस काग़ज़ के लफ़्ज़ से ,
जो आज कल हर किसी के लिए बन जाते है नये !

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