ज़िंदगी की रफ़्तार कितनी भी तेज़ क्यूँ न हो कभी न कभी थम जाती है, हम देखते रह जाते है वक़्त के तक़ाज़े को जब रेत हाथो से फिसल जाती है ।

ज़िंदगी की रफ़्तार कितनी भी तेज़ क्यूँ न हो कभी न कभी थम जाती है, हम देखते रह जाते है वक़्त के तक़ाज़े को जब रेत हाथो से फिसल जाती है ।

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