मिलों का सफ़र था और मंज़िल का ठिकाना न था, छत भी किसी न सिर से छीन ली जैसे हमें किसी भी रास्ते प जाना न था ।

मिलों का सफ़र था और मंज़िल का ठिकाना न था, छत भी किसी न सिर से छीन ली जैसे हमें किसी भी रास्ते प जाना न था ।

0 comments: